Comprehensive Texts
|
अथ संतानसंसिद्धिसमाकुलितचेतसाम्। |
|
न चापुत्रस्य लोकोऽस्ति पितरोऽधः पतन्ति च। |
|
देवर्षिपितृपूजासु निरतानामभक्तितः। |
|
अर्थिभ्योऽर्थमदातृ़णां विद्यमानेऽर्थसंचये। |
|
हरिशंकरयोः पादपद्मार्चाविरतात्मनाम्। |
|
इत्यादिदोषदुष्टानां पापानां गृहमेधिनाम्। |
|
एवमादिकदोषापनोदनी सुतसिद्धिदा। |
|
पुत्राप्तये गृहस्थो |
|
संयोज्य किंचन यथाविधि पञ्चगव्यं |
|
ततोऽग्निमाधाय चरुं च कृत्वा |
|
स्मृत्वा निजं पितरमप्यधरा निषण्णं |
|
व्याहृतीभिरथ पक्वहोमतः |
|
कलायुतैः षोडशमूर्तिमन्त्रै |
|
पक्वाहुतीनामपि वर्णसंख्यं |
|
पञ्चाक्षरेण पुरुषात्मकमन्यदन्य |
|
पुरुषः पुरुषात्मकं प्रकृत्या |
|
गुरवेऽप्यथ दक्षिणां प्रदत्त्वा |
|
एकह्रासादन्यमब्दं द्विजाती |
|
पितृदेवताप्रसादा |
|
समुनिसुरपितृभ्यो ब्रह्मचर्येण यज्ञै |
|
वर्णादिको हलोमन्त्रः संकोचाख्यो ध्रुवादिकः। |
|
अथो हिताय जगतां प्रथितं शितचेतसाम्। |
|
स्वच्छः स्वच्छन्दसहितोऽतुच्छधीः सक्तहृच्छयः। |
|
अग्रगण्यः समग्रज्ञो निग्रहानुग्रहक्षमः। |
|
शुक्लशुक्लांशुकोत्कृष्टकर्मा विक्लवमानसः। |
|
इष्टदोऽनिष्टसंहर्ता दृष्टादृष्टसुखावहः। |
|
शान्तो दान्तः शान्तमना नितान्तं कान्तविग्रहः। |
|
ऊहापोहविदव्यग्रो लोभमोहविवर्जितः। |
|
निरंशसांशवित्सर्वसंशयच्छिदसंशयः। |
|
व्याधिरप्रापितव्याधिः समाधिविधिसंयुतः। |
|
वर्गोपेतसमारम्भो गभीरो दम्भवर्जितः। |
|
असौ मृग्यश्च दृश्यश्च सेव्यश्चाभीष्टमिच्छता। |
|
तस्य पादारविन्दोत्थरजःपटलरूषणः। |
|
नित्यशः कायवाक्चित्तैस्त्रिद्व्येकाब्दादिकावधि। |
|
तं तथाविधमालक्ष्य सदावितथवादिनम्। |
|
अस्तेयवृत्तिमास्तिक्ययुक्तं मुक्तिकृतोद्यमम्। |
|
ब्रह्मचर्यपरं नित्यं परिचर्यापरं गुरोः। |
|
अधीतवेदं स्वाधीनमनाधिं व्याधिवर्जितम्। |
|
सुवेषमेषणातीतममलं विमलाशयम्। |
|
परोपकारनिरतं विरतं परदूषणे। |
|
स्मरन्तमस्मराबाधं स्मितोपेतमविस्मितम्। |
|
अलसं मलसंक्लिन्नं क्लिष्टं क्लिष्टान्ववायजम्। |
|
रागिणं रोगिणं भोगलालसं बालसंमतम्। |
|
नृशंसमन्धं बधिरं पङ्गुं व्यङ्गममङ्गलम्। |
|
आदित्सुं कुत्सितं वत्सं बीभत्सं मत्सरात्मकम्। |
|
लुब्धं त्वलब्धवैदग्ध्यं स्तब्धं लुब्धकबान्धवम्। |
|
प्रत्यग्रमुग्रं व्यग्रेहमग्रगण्यं दुरात्मनाम्। |
|
स्वार्थकृत्यं प्रसक्तार्थं निरर्थारम्भणं शठम्। |
|
यदि गृह्णाति तद्दोषः प्रायो गुरुमपि स्पृशेत्। |
|
तथा शिष्यकृतो दोषो गुरुमेति न संशयः। |
|
तस्मिन्गुरौ सशिष्ये तु देवताशाप आपतेत्। |
|
छायाज्ञापादुकोपानद्दण्डांश्च शयनासने। |
|
व्याख्याविवादः स्वातन्त्र्यकामिता काम्यजृम्भिता। |
|
अग्राम्यधर्मं विण्मूत्रसर्गनिष्ठीवनादिकम्। |
|
ग्राम्योक्तीरनृतं निन्दामृणं च वसुविक्रयम्। |
|
इष्टं वानिष्टमादिष्टं गुरुणा यत्तु गुर्वपि। |
|
कर्मणा मनसा वाचा सदा भक्तियुजा गुरुम्। |
|
लोकोद्वेगकरी या च या च कर्मनिकृन्तनी। |
|
रम्यमप्युज्ज्वलमपि मनसोऽपि समीप्सितम्। |
|
इत्याचारपरः सम्यगाचार्यं यः समर्चयेत्। |
|
देवानृषीनपि पितृ़नतिथींस्तथाग्निं |
|
इत्थं मूलप्रकृत्यक्षरविकृतिलिपिव्रातजातग्रहर्क्ष |
|
यदाश्रया विप्रकृतिप्रभावतो |