Comprehensive Texts
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अथाभिवक्ष्ये महितस्य मन्त्र |
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ऋषिरभिहितो वसिष्ठ |
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त्रिभिस्तु वर्णैर्हृदयं शिरश्च |
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प्राक्प्रत्यग्याम्यसौम्ये शिरसि च वदनोरोगलांसेषु नाभौ |
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चरणाग्रसंधिषु गुदा |
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वर्णान्न्यस्य शिरोभ्रू |
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वसिष्ठादिक्रमेणैव अङ्गन्यासं समाचरेत्। |
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अच्छस्वच्छारविन्दस्थितिरुभयकराङ्कस्थितं पूर्णकुम्भं |
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प्रासादोक्ते पीठे |
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अङ्गैराद्यार्काद्यैः |
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अर्केन्दुधरणितोया |
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रमा राका प्रभा ज्योत्स्ना पूर्णोषा पूरणी सुधा। |
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आर्द्रा प्रज्ञा प्रभा मेधा कान्तिः शान्तिर्द्युतिर्मतिः। |
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द्वात्रिंशदिति निर्दिष्टाः शक्तयोऽनुष्टुभः क्रमात्। |
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इति परिपूज्य महेशं |
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प्रजपेल्लक्षायत्या |
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दधिदूर्वेति दशैता |
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भवति नरः सिद्धमनु |
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तावद्भिर्द्विजवृक्षै |
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न्यग्रोधायुतहोमा |
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सिद्धार्थायुतहोमो |
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दुग्धहुतात्कान्तिः स्या |
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दूर्वायुतेन जुहुया |
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निजजन्मदिने पयोन्धसा वा |
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काष्मर्यदारुसमिधां त्रिशतं सहस्रं |
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स्नात्वार्काभिमुखोऽम्भसि स्थित इमं मन्त्रं सहस्रं जपे |
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गायत्रिवर्णपरिपूर्णतनुस्तु भानु |
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एभिस्त्रिभिर्मनुवरैस्तु शताक्षराख्यो |
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ऋष्याद्याः पूर्वोक्ता |
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नयनं पञ्चदशार्णैः |
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स्मर्तव्याखिललोकवर्ति सततं यज्जङ्गमस्थावरं |
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लक्षायतो जपविधिः |
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सौरे पीठे पूज्या |
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पञ्चम्यावृतिरुक्ता |
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इति शताक्षरमन्त्रसमर्चना |
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दुग्धाक्तैर्जुहुयात्सहस्रममृताकाण्डैस्तु दीर्घायुषे |
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अनुदिनमघशान्त्यै संयतात्मा सहस्रं |
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शतं शतं प्रातरतन्द्रितोद्यतो |
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सर्वान्कामानवाप्नोति मन्त्रमेनं जपेत्तु यः। |
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प्रणवव्याहृत्याद्या व्याहृतितारान्तिका च मन्त्री च। |
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मनुममुमघशान्त्यै पत्पदाद्यं प्रजप्या |
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शताक्षरमनोरयं क्रम उदीरितः संग्रहा |
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संवादसूक्तविहितं |
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ऋषिरपि संवननोऽस्या |
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ब्रह्माख्यो हृदयमनुः शिरश्च विष्णू |
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धवलनलिनराजच्चन्द्रमध्ये निषण्णं |
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सहस्रकाणां दशभिश्चतुर्भिर |
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यजेत्पुराङ्गैश्च तदर्चनाविधौ |
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संवादसूक्ते विधिनेत्यनेन |
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पायसेन मधुरत्रयभाजा |
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जुहुयात्कलाचतुष्कैः |
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तद्वदृचं प्रतियोज्य |
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प्रतिपादमथर्क्पादं |
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अक्षरपादात्ित्रष्टु |
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उद्दिश्य यद्यदिह मन्त्रितमो जुहोति |
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ऋग्वारुणी ध्रुवा स्वाद्या या सा त्रिष्टुब्निगद्यते। |
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अष्टभिः सप्तभिः षड्भिः पुनस्तावद्भिरक्षरैः। |
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अङ्गुल्यग्रससंधिपायुशिवसंज्ञाधारनाभिष्वथो |
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अच्छांशुकाभरणमाल्यविलेपनाढ्यः |
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अङ्गैरष्टभिरहिपै |
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वसुभिः प्रसाद्य देशिक |
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ऋगियमृणमोचनी स्या |
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इक्षोः सितैश्च शकलै |
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वैतससमिदयुतहुता |
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शतभिषजि समुदितेऽर्के |
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पाशाबद्धं वैरिण |
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पाशनिबद्धं वैरिण |
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दौग्धान्नैर्भृगुवारे |
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पश्चिमसंध्यासमये |
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शालीघृतसंसिक्ताः |
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प्रत्यङ्मुखोऽथ मन्त्री |
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बहुना किमनेन मन्त्रिमुख्यो |
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अथ लवणमनुं वदामि साङ्गं |
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लवणाम्भसि चेत्याद्या द्वितीया लवणे इति। |
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ऋक्पञ्चमी तु या ते स्याद्यथा प्रोक्तमथर्वणि। |
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चिट्यक्षरैः षडङ्गं वा प्रणवाद्यैर्निगद्यते। |
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सपञ्चभिर्युगार्णेण जातियुक्तैः समाहितः। |
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अरुणोऽरुणपङ्कजसंनिहितः |
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नीलवरांशुककेशकलापा |
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करकमलविराजच्चक्रशङ्खातिशूला |
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सुरौद्रसितदंष्ट्रिका त्रिणयनोर्ध्वकेशोल्बणा |
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खेटासिमुसलतोमर |
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अयुतं नियतो मत्रमृक्पञ्चकसमन्वितम्। |
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दशांशेन हुनेत्सिद्ध्यै हविषा घृतसंयुजा। |
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वह्निरात्री वरे स्यातां वश्याकर्षणकर्मणोः। |
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आरभ्य कर्मकृन्मन्त्री तृतीयां कृष्णपक्षजाम्। |
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निखन्यात्तत्र कुण्डं च दोर्मात्रं त्र्यश्रमेखलम्। |
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एतां साध्यर्क्षवृक्षेण शालिपिष्टेन चापराम्। |
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तासु हृद्देशलिखितसाध्याख्यासु समाहितः। |
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उक्तानां दारवीं कुण्डे खनेन्मन्त्राभिमन्त्रिताम्। |
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लम्बयेदम्बरे सिद्धमयीमूर्ध्वमधोमुखीम्। |
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रक्तमाल्याम्बरो मन्त्री कृतरक्तानुलेपनः। |
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कुडुबं पोतलवणं सुश्लक्ष्णं परिचूर्णितम्। |
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आलोड्य गुडमध्वाज्यैर्विस्पष्टावयवामथ। |
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तस्यां च स्थापयेत्प्राणान्गुर्वादेशविधानतः। |
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ऋक्पञ्चकं पञ्चविंशत्संख्यं प्रतिकृतिं स्पृशन्। |
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सतारैश्चिटिमन्त्रार्णैश्चतुर्विंशतिसंख्यकैः। |
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सकण्ठहृदयोरोजकुक्षिनाभिकटीषु च। |
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अधो गुह्यादभेदः स्यादूर्ध्वं भेदेऽन्विते सति। |
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अङ्गुष्ठसंधिप्रपदजङ्घाजानूरुपायुषु। |
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कंधराचिबुकास्येषु घ्राणदृक्कर्णयुग्मके। |
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उपलिप्याथ कुण्डं तद्बहिर्गोमयवारिणा। |
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प्रज्वाल्य साध्योडुतरुकाष्टैरभ्यर्च्य दीप्तिमान्। |
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देवतां प्रतिपाद्यार्घ्यं दत्त्वा कार्यार्थसिद्धये। |
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त्वमाननममित्रघ्न निशायां हव्यवाहन। |
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जातवेदो महादेव तप्तजाम्बूनदप्रभ। |
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ईशे ईश्वरि शर्वाणि ग्रस्तं मुक्तं त्वया जगत्। |
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तमोमयि महादेवि महादेवस्य सुव्रते। |
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दुर्गे दुर्गादिरहिते दुर्गसंशोधनार्गले। |
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नमस्ते दह शत्रुं मे वशमानय चण्डिके। |
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भद्रकालि भवाभीष्टे भद्रसिद्धिप्रदायिनि। |
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शूलादिशक्तिवज्राद्यैरुत्कृत्योत्कृत्य मारय। |
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पुनः प्रतिकृतेरङ्गसप्तकं निशितायसा। |
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साध्यं संस्मृत्य शितधीर्जुहुयात्सप्तसंख्यया। |
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दक्षहस्तं तृतीयं स्याद्गलादूर्ध्वं चतुर्थकम्। |
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सप्तमं वामपादं स्यादन्यापि स्याद्धुतक्रिया। |
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एकादशांशभिन्नैर्वा तदङ्गैः सप्तभिर्हुनेत्। |
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द्वितीयो दक्षिणकरस्तृतीयः शिर उच्यते। |
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अधोभागस्तु षष्ठः स्याद्वामभागस्तु सप्तकः। |
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अर्चयित्वा दण्डदीर्घं प्रणमेद्धव्यवाहनम्। |
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दक्षिणां सप्तकर्षां तु दद्यान्मारणकर्मणि। |
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एवं कृतेन मन्त्रीष्टं लभते होमकर्मणा। |
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सनिम्बतिलसिद्धार्थव्रणकृत्तैलसंयुतैः। |
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वराहपारावतयोः पुरीषेण समन्वितैः। |
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पूर्ववत्पुत्तलीं तेन लोणचूर्णेन कारयेत्। |
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पूर्वोक्ताभिः पुत्तलीभिः कुण्डे दक्षिणदिङ्मुखे। |
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उपस्थिते त्वर्धरात्रे सव्यपाणिस्थशस्त्रकः। |
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समापयेद्दक्षपादं विकारेणायसो वशी। |
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तस्यां रात्र्यामुपोष्याथ परेऽहनि च साधकः। |
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विमुक्तपापो भूत्वा तु स पुनर्विहरेत्सुखम्। |
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पृथगष्टोत्तरशतावृत्त्या हुत्वा बलिं हरेत्। |
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इति लवणमनोर्विधानमेवं |
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अथ वा लवणैः परागभूतै |
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नारीनरान्वा नगरं नृपान्वा |
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वस्तुनोक्तेन क्रियतां साङ्गोपाङ्गेन पुत्तली। |
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निक्षिप्य हृदये किंचित्कीटान्तां संस्पृशन्पुनः। |
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अथास्य हृदये स्मृत्वा वर्तुलं वायुमण्डलम्। |
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तत्र भूतास्तु तन्मात्राशब्दाद्यं श्रवणादिकम्। |
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तत्सर्वं तेन चण्डेन समीरेण समीरितम्। |
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प्रवेशयेच्च पुत्तल्यां पुनस्तेनैव वर्त्मना। |
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याद्यष्टकान्भ्रमरवद्धृदयाम्बुजस्थां |
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हृत्पद्ममध्यस्थिततन्तुजालै |
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वायव्याग्नेयैन्द्रवारीण्महेश |
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अवामनासामार्गेणैवाकृष्याकृष्य पुत्तलीम्। |