Comprehensive Texts
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अथ वक्ष्यामि द्यायास्त्रिष्टुभः प्रवरं विधिम्। |
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मारीचः काश्यपो ज्ञेय ऋषिश्छन्दः स्वयं स्मृतम्। |
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नवभिः सप्तभिः षड्भिः सप्तभिश्च तथाष्टभिः। |
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अङ्गुष्ठगुल्फजङ्घासु जानूरुकटिगुह्यके। |
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स्कन्धयोरुभयोर्मध्ये बाहुमूलोपबाहुषु। |
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मुखनासाक्षिकर्णेषु मस्तमस्तिष्कमूर्धसु। |
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शिखाललाटदृक्कर्णयुगोष्ठरसनासु च। |
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भास्वद्विद्युत्करालाकुलहरिगलसंस्थारिशङ्खासिखेटे |
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इति विन्यस्तदेहस्तु कुर्याज्जप्यादिकाः क्रियाः। |
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ततोऽस्त्रक्लृप्तिः संप्रोक्ता स्यात्प्रयोगविधिस्ततः। |
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यन्त्रं षड्गुणितं कृत्वा दुर्वर्णलसिताश्रकम्। |
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अत्र पीठं यजेन्मन्त्री क्रमात्सनवशक्तिकम्। |
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व्याघ्रसिंहमुखीदुर्गात्रिष्टुभो नव शक्तयः। |
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एकेन पूरयित्वास्मिन्नावाह्य च विभावसुम्। |
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मूर्तीरभ्यर्चयेदग्नेर्जातवेदादिकाः क्रमात्। |
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अर्चयेद्दिक्षु कोणेषु निवृत्त्यादीर्यथाक्रमम्। |
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लोकपालांश्च तद्धेतीर्विधिनेति समर्चयेत्। |
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सेन्दुखण्डा सुम्भहन्त्री सनभश्चारिणी तथा। |
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मरुद्वेगा रात्रिसंज्ञा तीव्रकोपा यशोवती। |
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तिरस्क्रिया वेदमाता तथान्या दमनप्रिया। |
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षष्ठी च दण्डिनी तिग्मा दुर्गा गायत्रिसंज्ञका। |
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वेदना वह्निगर्भा च सिंहवाहाह्वया तथा। |
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त्यक्तदोषा निःसपत्ना चत्वारिंशच्चतुर्युताः। |
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ईदृशं यन्त्रमारुह्य जपेच्छिष्यः सुयन्त्रितः। |
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सर्वजापेषु संज्ञेया गायत्र्या द्विगुणो जपः। |
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तिलराज्यनलक्षीरवृक्षेध्महविराज्यकैः। |
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चत्वारि चत्वारिंशच्च चतुःशतसमन्वितम्। |
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एवं संसिद्धमन्त्रस्य स्युरस्त्राद्याः क्रिया मताः। |
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विलोमपाठो वर्णानामस्त्रमाहुर्मनीषिणः। |
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जप्तुकामो मनुं त्वेनं पादांस्तु प्रतिलोमतः। |
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आद्याः पञ्चाक्षरपदास्त्रयः सप्ताक्षरः परः। |
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ग्न्याद्यं ज्ञानेन्द्रियं कामं द्वितीयं पाञ्चभौतिकम्। |
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षडूर्मयः पञ्चमं स्यात्षष्ठः षट्कौशिको मतः। |
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साङ्गः सत्प्रतिपत्तिकः सगुरुपद्वन्द्वप्रमाणक्रमा |
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अनुलोमजपेऽङ्गानामपि पाठोऽनुलोमतः। |
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अन्तः पादप्रतीपे हि तथा तानि भवन्ति हि। |
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प्रतिपत्तिविशेषांश्च तत्र तत्र विचक्षणः। |
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जपः पुरोक्तसंख्यः स्याद्धुतक्लृप्तिस्तथा भवेत्। |
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अथ वा पञ्चगव्योत्थचरुणा हुतमुच्यते। |
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तत्र स्युर्मन्त्रवर्णेभ्यस्तावत्यो वह्निदेवताः। |
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तत्पञ्चकं च प्रत्येकमावृतं पञ्चभिः पृथक्। |
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प्रत्येकं षोडशानां तु कोटयः परिचारिकाः। |
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एतावत्यस्तु जातास्तद्विस्तरं पुनरूहयेत्। |
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तिर्यञ्चो भौतिकाः प्रोक्ता धातूत्थास्तूभया नराः। |
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क्लीबा मुखद्वयोपेता गोचरोत्थाः स्त्रियो मताः। |
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आभिः सर्वाभिरपि च शिखाभिर्जातवेदसः। |
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आरम्भे मानुपाणि स्युर्नक्षत्राण्याभिचारके। |
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अन्त्याश्वीन्द्वर्कादिति |
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नन्दास्वारभ्य रिक्तासु प्रयोज्यात्मनि संहरेत्। |
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संहरेत्संग्रहं कुर्याद्वारे त्वाचार्ययोः सुधीः। |
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दिनास्त्रं दिनकृद्युक्तं वारग्रहसमन्वितम्। |
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नक्षत्रात्मा हुताशः स्यात्तिथ्यात्मेन्दुरुदाहृतः। |
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रक्षानिग्रहकर्मणोरनु पराग्वक्त्राः प्रधानाकृति |
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पीतायोमुष्टिगदा |
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सुसिता पाशाङ्कुशयु |
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रक्ता पाशाङ्कुशिनी |
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लवणैस्त्रिमधुरसिक्तै |
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सकपालशूलपाशा |
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ध्यात्वा धूम्रां मुसल |
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धूम्रा तर्जनिशूला |
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शिखिशूलकराग्निनिभा |
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कृष्णा शूलासिकरा |
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नक्षत्रवृक्षसमिधो |
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नक्षत्रवृक्षसमिधां |
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मरिचं क्षौद्रसमेतं |
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हृदये वदने च रिपोः |
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सैव प्रतिकृतिरसकृ |
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विधिना ज्वरपीडा स्या |
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प्राक्प्रोक्तान्भूतवर्णान्दश दश युगशो बिन्दुयुक्तान्नमोन्ता |
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ऊदोद्गादिलळाः को |
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मरुतः कपोलबिन्दुक |
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उन्मत्तक्ष्वेलनेत्रद्रुमभवसमिधां सप्तसाहस्रिकान्तं |
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सामुद्रे च सहिङ्गुजीरकविषे साध्यर्क्षवृक्षाकृतिं |
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अर्कस्यन्दनबद्धपन्नगमुखग्रस्ताङ्घ्रिमाशाम्बरं |
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आर्द्रांशुकोऽग्निमनुना त्वथ सप्तरात्रं |
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तालस्य पत्रे भुजपत्रके वा |
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आधाय वैश्वानरमादरेण |
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सिंहस्थाशरनिकरैः कृशानुवक्त्रै |
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कृत्वा स्थण्डिलमङ्गणे भगवतीं न्यासक्रमैरर्चये |
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विधिवदभिज्वाल्यानल |
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कुसुमरसलुलितलोणै |
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शुद्धैश्च तण्डुलैरपि |
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प्राशितसंपातस्य |
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कृत्या नश्यति तस्मिं |
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ब्रह्मद्रुमफलकान्ते |
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विलिखेत्क्रमेण मन्त्रा |
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आज्येनाष्टसहस्रं |
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सिकताचरुगव्याश्मक |
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मध्याष्टाशान्तासु च |
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तिथिषु तु कालाष्टम्यां |
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हस्तश्रवणमखासु |
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मध्ये च मूलमनुना |
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तास्ताश्च देवता अपि |
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सिकताः षोडशकुडुवं |
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अर्केऽजस्थेऽब्धिगायामपरिमितजलायां समादाय शुद्धाः |
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एवं मृदुपलचरवः |
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व्रीहिभिरन्नैः क्षीरैः |
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यद्यद्वाञ्छति पुरुष |
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साहिझषोपलमुदधिं |
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तस्मादेनं मनुवरमभीष्टाप्तये संयतात्मा |