Comprehensive Texts
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अथाखिलार्थानुततैव शक्ति |
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ताराह्वयो व्याहृतयश्च सप्त |
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जप्यः स्यादिह परलोकसिद्धिकामै |
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तेषां शुद्धकुलद्वयोत्थमहसामारभ्य तन्तुक्रियां |
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आदौ तारः प्रकृतिविकृतिप्रोत्थितोऽसौ च मूला |
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प्रकाशितादौ प्रणवप्रपञ्चता |
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भूःपदाद्या व्याहृतयो भूशब्दस्तदि वर्तते। |
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भूतत्वात्कारणत्वाच्च भुवःशब्दस्य संगतिः। |
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महस्त्वाच्च महत्त्वाच्च महःशब्दः समीरितः। |
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तपो ज्ञानतया चैव तथा तापतया स्मृतम्। |
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प्रणवस्य व्याहृतीनामतः संबन्ध उच्यते। |
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बिन्दुर्महस्तथा नादो जनः शक्तिस्तपः स्मृतम्। |
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प्रणवस्य व्याहृतीनां गायत्र्यैक्यभथोच्यते। |
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तद्द्वितीयैकवचनमनेनाखिलवस्तुनः। |
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अभिध्येयं परानन्दं परं ब्रह्माभिधीयते। |
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धातोरिह समुत्पन्नं प्राणिप्रसववाचकात्। |
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वरेण्यं वरणीयत्वात्सेवनीयतया तथा। |
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पूर्वस्याष्टाक्षरस्यैवं व्याहृतिर्भूरिति स्मृता। |
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देवस्य वृष्टिदानादिगुणयुक्तस्य नित्यशः। |
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ध्यैचिन्तायामतो धातोर्निष्पन्नं धीमहीत्यदः। |
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दृश्यो हिरण्मयो देव आदित्ये नित्यसंस्थितः। |
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यः सूक्ष्मः सोऽहमित्येवं चिन्तयामः सदैव तु। |
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धियो बुद्धीर्मनोरस्य च्छान्दसत्वाद्य ईरितः। |
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यत्तु तेजो निरुपमं सर्वदेवमयात्मकम्। |
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न इति प्रोक्त आदेशः षष्ठ्यासौ युष्मदस्मदोः। |
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तृतीयाष्टाक्षरस्यापि व्याहृतिः स्वरितीरिता। |
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षडक्षराश्च चत्वारः स्युश्चतुर्विंशदक्षराः। |
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वरेण्यं भजतां पापविनाशनकरं परम्। |
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उक्तैवमत्र गायत्री पुनस्तच्छिर उच्यते। |
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तदात्मकं जगत्सर्वं रसस्तेजोद्वयं युतम्। |
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यदानन्दात्मकं ब्रह्म सत्त्यज्ञानादिलक्षणम्। |
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एतत्तु वेदसारस्य शिरस्त्वाच्छिर उच्यते। |
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फलार्थी तदवाप्नोति मुमुक्षुर्मोक्षमृच्छति। |
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दन्तानां धावनं चैव जिह्वानिर्लेखनादिकम्। |
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आपो हि ष्ठा मयेत्यादिऋग्भिस्तिसृभिरेव च। |
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सूर्यश्चेत्यनुवाकेन पुनराचम्य पूर्ववत्। |
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आदित्याभिमुखो भूत्वा तद्गतात्मोर्ध्वलोचनः। |
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हृत्स्थं सर्वस्य लोकस्य मण्डलान्तर्व्यवस्थितम्। |
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एनस्ताः प्रतिनिघ्नन्ति जगदाप्याययन्ति च। |
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क्रमात्तारादिमन्त्राणामृष्यादीन्विन्यसेत्सुधीः। |
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छन्दश्च देवी गायत्री परमात्मा च देवता। |
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विश्वामित्रवसिष्ठाख्यावृषयो व्याहृतीरिताः। |
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त्रिष्टुब्जगत्यौ च्छन्दांसि कथ्यन्ते देवता अपि। |
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विश्वेदेवा इति प्रोक्ताः सप्त व्याहृतिदेवताः। |
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विश्वामित्रस्तु गायत्र्या ऋषिश्छन्दः स्वयं स्मृतम्। |
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छन्दश्च देवी गायत्री परमात्मा च देवता। |
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गायत्रीं शिरसा विद्वाञ्जपेत्ित्रः स्यादुपासना। |
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व्यापयेद्व्याहृतीः सम्यग्गायत्रीं च शिरोयुताम्। |
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आत्मन्यधश्चोपरितो दिग्भ्यस्ताः समुपानयेत्। |
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एतत्त्रयं त्रिशः कुर्यादृजुकायस्त्वनन्यधीः। |
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ध्यानस्य केवलस्यास्य व्याख्याने दर्शितः क्रमः। |
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शतं वाथ सहस्रं वा मन्त्रार्थगतमानसः। |
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लिपिन्यासादिकान्साङ्गान्महन्न्यासादिसंयुतान्। |
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पादसंधिचतुष्कान्धुनाभिहृद्गलयोर्द्वयी। |
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वारुणैन्दवयाम्यप्रागूर्ध्वकेषु मुखेषु च। |
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शिरोभ्रूमध्यनयनवक्त्रकण्ठेषु वै क्रमात्। |
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सब्रह्मविष्णुरुद्रैश्च सेश्वरैः ससदाशिवैः। |
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एवं कृत्वा तु सिद्ध्यर्थं गायत्रीं दीक्षितो जपेत्। |
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शक्तिभिः प्राक्समुक्ताभिः सौरं पीठं समर्चयेत्। |
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गव्यैर्वा पञ्चभिः क्वाथजलैर्वा पूरयेत्ततः। |
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मन्दाराह्वयरोचनाञ्जनजपाख्याभैर्मुखैरिन्दुम |
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संचिन्त्य भर्तारमिति प्रभाणां |
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प्रह्लादिनीं प्रभां नित्यां सविश्वंभरसंज्ञकाम्। |
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तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनिं जयावहाम्। |
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मातृभिश्चारुणाभिश्च षष्ठ्यथो सप्तमीग्रहैः। |
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आवृतिः कथिता चेति विधानं परमीदृशम्। |
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अथ पुनरमुमभिषिञ्चे |
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भूयस्त्वक्षरलक्षं |
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एकैकं त्रिसहस्रं |
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दुरितोच्छेदनविधये |
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दूर्वाभिः सतिलाभिः |
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नष्टश्रीरपि भूयो |
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इति परमरहस्यं वेदसारस्य सारं |