Comprehensive Texts
|
अथ संप्रति विष्णुपञ्जरस्य |
|
शक्तेर्द्वादशगुणिते |
|
विष्णुं लिखेन्मध्यगशक्तिबिन्दौ |
|
तारं हृदयं भगव |
|
द्वादशाक्षरमन्त्रान्ते भवेतां कवचास्त्रकौ। |
|
क्रमेण तद्वर्णविकारजाता |
|
यन्त्रस्य बीजेषु चतुर्षु पूर्वं |
|
शङ्खहलमुसलशूला |
|
सप्रणवत्दृ(?)दयभगव |
|
सहस्रारपदं पूर्वं कौमोदकि ततो भवेत्। |
|
प्रोक्तानि वर्मास्त्रान्तानि निजमन्त्राणि वै क्रमात्। |
|
ततो महामुसलकं महाशूलं ततः परम्। |
|
दण्डादीनामथाष्टानामन्ते युञ्ज्यान्नमःपदम्। |
|
अन्तरा योजयेन्मन्त्री नारसिंहं पुनः सुधीः। |
|
योजयित्वा नृसिंहात्प्राक् सिंहमन्त्रं समापयेत्। |
|
हरिपूर्वं वाहनाय प्राणात्मन इतीरयेत्। |
|
स त्रिष्टुभा वह्निगृहेण पूर्वं |
|
अनुलोमविलोमगैश्च वर्णै |
|
तद्बहिर्मण्डलं सर्वलक्षणैरभिलक्षितम्। |
|
अग्नीषोमात्मकमरिगदाशार्ङ्गखड्गैः सशङ्खै |
|
विष्णुं भास्वत्किरीटं मणिमकुटकटीसूत्रकेयूरहार |
|
अभ्यर्च्य पूर्ववत्पीठं नवशक्तिसमन्वितम्। |
|
चक्रं च चक्राङ्ककिरीटमौलिं |
|
पूज्या गदा गदाङ्कित |
|
श्यामं शार्ङ्गाङ्कितकं |
|
खड्गं सखड्गशिरसं |
|
शङ्खं सशङ्खशिरसं |
|
शङ्खोक्तचिह्नभूषा |
|
दण्डादिकांस्तथाष्टौ |
|
दंष्ट्राग्रलग्नवसुधं सजलाम्बुवाह |
|
अर्कानलोज्ज्वलमुखं नयनैस्त्रिभिश्च |
|
अग्रे समग्रबलमुग्रतनुं स्वपक्ष |
|
भूयोऽपि केशवेन्द्रा |
|
निवेदिते होमविधिश्च कार्यो |
|
जुहुयाच्च वामदेवा |
|
जुहुयादष्टोर्ध्वशतं |
|
त्रिष्टुबनुष्टुप्तत्पद |
|
आराध्य च विसृज्याग्निमभिषिच्य सुसंयतः। |
|
छन्दस्त्वनुष्टुप् त्रिष्टुप् च मुनिभिः समुदाहृते। |
|
अष्टार्णचक्रमनुमध्यगतैश्च पादै |
|
विष्णुः प्राच्यादिकमथ जपेन्नारसिंहोऽम्बरान्तं |
|
नमो भगवते सर्वविष्णवे विश्वरूपिणे। |
|
अर्केन्दुवह्निनिलयस्फुरितत्रिमन्त्र |
|
विष्णोः सांनिध्यलब्धोल्लसितबलचलद्धस्तदण्डोद्यतास्त्रै |
|
पूर्वं स्थाने हृषीकेशमन्त्रयुक्तं विधानवित्। |
|
योजयित्वा जपेत्पश्चाच्चक्रादिषु यथाक्रमम्। |
|
पूर्णेषु षोडशेष्वेवमाद्यं पादे वराहके। |
|
चतुर्थं च क्रमं ते च योजयित्वा जपेत्सुधीः। |
|
संयोज्य कृच्छ्रे महति जपेन्मन्त्री विधानवित्। |
|
सिकतोपलसर्वादीन्साधयेदथ तैः क्रियाः। |
|
मध्ये च षोडशाशान्ते खनेदष्टादशावटान्। |
|
हस्तागाधांस्तथायामांश्चतुरश्रान्समन्ततः। |
|
गोमयेनोपलिप्येत नारीयस्थाप्यवस्त्वपि। |
|
ततो मध्यमकुण्डस्य प्रविश्य पुरतो गुरुः। |
|
स्थापयेद्वैष्णवे स्थाने विश्वरूपधिया सुधीः। |
|
पुनः शङ्खादिकांस्तद्वत्कुण्डेष्वश्राश्रितेष्वपि। |
|
मध्ये पुनरधश्चोर्ध्वं कोलकेसरिणौ यजेत्। |
|
ततः समस्थलीकृत्य क्रमात्समुपलिप्य च। |
|
यज्ञे काञ्चनपत्रस्थे पूजयेत्पूर्ववत्प्रभुम्। |
|
हुनेच्च पूर्वसंदिष्टैर्द्रव्यैः पूर्वोक्तमार्गतः। |
|
क्रमाच्चक्रादिमूर्तीनां पञ्चपूरान्धसा सुधीः। |
|
दत्वा सुवर्णं वासांसि गुरवे ब्राह्मणानपि। |
|
तत्रोपसर्गा नश्यन्ति नरनारीमहीभृताम्। |
|
अश्मपातादिका ये च भया नश्यन्ति ते चिरात्। |
|
धनधान्यसमृद्धिश्च वर्धते तत्कुलं क्रमात्। |
|
रक्षोभिरक्षितबलैरसुरैश्च दैत्यैः |