Comprehensive Texts
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अथ प्रणवसंज्ञकं प्रतिवदामि मन्त्रं परं |
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आद्यस्वरः समेतो |
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मन्त्रस्यास्य मुनिः प्रजापतिरथ च्छन्दश्च देव्यादिका |
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विष्णुं भास्वत्किरीटाङ्गदवलययुगाकल्पहारोदराङ्घ्रि |
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दीक्षितो मनुमिमं शतलक्षं |
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सर्पिःपायसशाली |
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अभ्यर्च्य वैष्णवमथो विधिनैव पीठ |
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वासुदेवः संकर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः। |
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चतुर्भुजाश्चक्रशङ्खगदापङ्कजधारिणः। |
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सशान्तिश्रीसरस्वत्यौ रतिश्चाश्रिदलाश्रिताः। |
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आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मानस्तु मूर्तयः। |
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ज्वलज्ज्वालासमाभाः स्युरात्माद्या मूर्तिशक्तयः। |
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इत्थं मन्त्री तारममुं जापहुतार्चा |
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करपादमुखादिविहीनमना |
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योगाप्तिदूषणपरं त्वथ कामकोप |
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यमनियमासनपवना |
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सत्यमहिंसा समता |
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संतोषश्च सशौचो |
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रेचकपूरककुम्भक |
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संस्थापयेच्च नाड्ये |
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चित्तात्मैक्यधृतस्य |
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स्थानस्थापनकर्म |
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संस्थापयेच्च तत्रे |
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तत्प्रविचिन्त्य स तस्मिं |
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अथ वा शोषणदहन |
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पञ्चाशदात्मकोऽपि च |
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पूर्वमिडाया वदने |
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पिङ्गलया प्रतिमुञ्चे |
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संपूरयेत्सुधामय |
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सुजीर्णमितभोजनः सुखसमात्तनिद्रादिकः |
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प्रसारितं वामकरं निजाङ्के |
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तन्मध्यगतं प्रणवं |
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तन्मध्यगतं शुद्धं |
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ओंकारो गुणबीजं |
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अस्य तु वेदादित्वा |
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ऋक् च तदाद्यादिः स्या |
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उच्चार्योच्चार्य च तं |
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अथ वा बिन्दुं वर्तुल |
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अपमृत्युरोगपापजि |
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वदनामृतकरबिम्ब |
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अथ वा त्रिवलयबिन्दुग |
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तस्मिन्निधाय चित्तं |
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अथ वादिबीजमौ पुन |
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तेजस्यनन्यगे चिति |
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स्वात्मनि संहृत्यैवं |
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अथ वा योगोपेताः |
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जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ती |
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संज्ञारहितैरपि तै |
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पश्यति परं यदात्मा |
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तच्च तुरीयातीतं |
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ससुषुम्नाग्रकयोरपि |
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शक्त्यात्मना तुरीयः |
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नाभिर्हृदयं ग्रीवा |
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उत्क्रान्तौ परकाय |
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स्थानेष्वेष्वात्ममनः |
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कण्ठे भ्रूमध्ये हृदि |
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अवनिजलानलमारुत |
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एवं प्रोक्तैर्योगै |
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इति योगमार्गभेदैः |
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कम्पः पुलकानन्दौ |
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त्रैकाल्यज्ञानोहौ |
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ज्योतिःप्रकाशनं चे |
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प्राप्तिः प्राकाम्यं चे |
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इत्येवं प्रणवविधिः समीरितोऽयं |