Comprehensive Texts
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अथ श्रियो मन्त्रविधिः समासतो |
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वियत्तुरीयस्तु विलोमतोऽनल |
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ऋषिर्भृगुश्छन्दसि चोदिता निचृ |
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भूयाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्तस्वराभा |
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संदीक्षितोऽथ गुरुणा मनुवर्यमेनं |
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जपावसाने दिनकृत्सहस्र |
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रुचिराष्टपत्रमथ वारिरुहं |
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विभूतिरुन्नतिः कान्तिर्हृष्टिः कीर्त्तिश्च संनतिः। |
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आवाह्य सम्यक्कलशे यथाव |
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अङ्गैः प्रथमावृतिरपि |
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वासुदेवः संकर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः। |
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बलाकी विमला चैव कमला वनमालिका। |
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अयनैव च पूर्वसेवया |
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अम्भस्युरोजद्वयसे हि तिष्ठं |
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वसतावुपविश्य कैटभारेः |
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जुहुयादशोकदहने |
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समधुरनलिनानां लक्षहोमादलक्ष्मी |
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बिल्वं श्रीसूक्तजापी निजभुवि मुखजो वर्धयित्वास्य पूर्वं |
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हृदयकमलवर्णतः परस्ता |
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दक्षोऽस्य स्यादृषिश्छन्दसि सुमतिभिरुक्तो विराड्देवता च |
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पद्मस्था पद्मनेत्रा कमलयुगवराभीतियुग्दोःसरोजा |
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ध्यात्वैवं श्रियमपि पूर्वक्लृप्तपीठे |
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दीक्षातो जपतु रमारमेशभक्तो |
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इति मन्त्रजपादृतधीर्मधुर |
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समुद्रगायामवतीर्य नद्यां |
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नन्द्यावर्तैर्जुहुत भगभेऽभ्यर्च्य लक्ष्मीं सहस्रं |
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ताररमामायाश्रीः |
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त्रिभिस्तु वर्णैर्हृदयं शिरोभिः |
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हस्तोद्यद्वसुपात्रपङ्कजयुगादर्शा स्फुरन्नूपुर |
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लक्षं जपेन्मनुमिमं मधुरत्रयाक्तै |
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श्रीधरश्च हृषीकेशो वैकुण्ठो विश्वरूपकः। |
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भारतीपार्वतीचान्द्रीशचीभिरपि संयुता। |
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अनुरागो विसंवादो विजयो वल्लभो मदः। |
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अनन्तब्रह्मपर्यन्तैः पञ्चमीन्द्रादिभिर्मता। |
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संपूज्यैवं श्रियमनुदिनं यो जपेन्मन्त्रमेनं |
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श्रीमन्त्रेष्विति गदितेषु भक्तियुक्तः |
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आनन्दः कर्दमश्चैव चिक्लीतश्चेन्दिरासुतः। |
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आद्ये सूक्तत्रये च्छन्दोऽनुष्टुप्कांसे बृहत्यपि। |
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अनुष्टुबन्त्ये प्रस्तारपङ्क्तिश्छन्दांसि वै क्रमात्। |
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मूर्धाक्षिकर्णनासा |
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सहिरण्मयी च चन्द्रा |
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अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा |
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प्रारभ्याच्छां प्रतिपदमथ प्राप्तदीक्षो वियुक्त |
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पद्मा सपद्मवर्णा |
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मध्ये दिशाधिपाङ्गा |
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अन्नघृताभ्यां जुहुया |
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वासोभूषणगन्धा |
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व्यस्तैरपि च समस्तैः |
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एकैकं त्रित्रिशतं |
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कह्लारपद्मरक्तो |
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आदित्याभिमुखो जप्यात्तावत्तावच्च तर्पयेत्। |
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एवं करोति षण्मासं योऽसौ स्यादिन्दिरापतिः। |
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सकर्णिके सकिञ्जल्कोदरे पत्रान्तरालके। |
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जुहुयादन्त्ययाथर्चा शतमष्टोत्तरं जपेत्। |
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कांसोऽस्मीत्यनया सम्यगेकादश घृताहुतीः। |
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सूक्तैरेतैर्जुहुत जपताभ्यर्चयीतावगाहे |
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श्रीलक्ष्मीर्वरदा विष्णुपत्नी च सवसुप्रदा। |
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ससुवर्णप्रभा स्वर्णप्राकारा पद्मवासिनी। |
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अलंकारा तथा सूर्या चन्द्रा बिल्वप्रियेश्वरी। |
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तुष्टिः पुष्टिश्च धनदा तथान्या तु धनेश्वरी। |
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द्वात्रिंशदेताः श्रीदेव्या ये मन्त्राः समुदीरिताः। |
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नाभ्यक्तोऽद्यान्न नग्नः सलिलमवतरेन्न स्वपेद्वाशुचिः स |
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सुविमलचरितः स्याच्छुद्धमाल्यानुलेपा |
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दुष्टां कष्टान्ववायां कलहकलुषितां मार्गदृष्टामनिष्टा |
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शान्तः शश्वत्स्मितमधुरपूर्वाभिभाषी दयार्द्रो |
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श्रीमन्त्रभक्तः श्रितविष्णुदीक्षः |